रविवार, 26 जुलाई 2015
शुक्रवार, 17 जुलाई 2015
read another poem on river and enjoy
पर्वत से ही निकल रही है, सरस नीर की धार नदी. पशु-पक्षियों, पेड़ मानव से, करती सच्चा प्यार नदी. कल-कल छल-छल करती रहती, छेड़े मीठा राग नदी. वर्षा के मौसम में करती, कैसी भागमभाग नदी. बल खाकर चलती है ऐसी, जैसे कोई नाग नदी. तट पर बिखराती है साबुन, जैसे ढेरों झाग नदी. युग चाहे कितने ही बीते, बनी रही नित नयी नदी. छोड़ा कभी न अपने पथ को, रखती अजब दिमाग नदी. |
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