5CHINDI
शनिवार, 30 अप्रैल 2016
पाठ दिमागी लडाई
अक्बर - बीरबल की कोई भी कहानी कक्षा में सुनाये ।
आपने इस पाठ से क्या क्या सीखा ?
किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में बताये जो आपको प्रेरित करता हो ।
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016
अनमोल वचन
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016
पढे और समझे
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016
कविता मनभावन सावन के सभी प्रश्न उत्तर याद करे
अगले हफ़्ते चित्र वर्णन का अभ्यास करवाया जायेगा
संज्ञा विषय पर कक्षा परीक्षा ली जायेगी
सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
कक्षा मे अभ्यास करवाया गया
अगले सप्ताह भाषा अभ्यास करवाई जायेगी
शुक्रवार, 22 जनवरी 2016
कविता ' कोशिश करने वालो की हार नहीं होती ' के बाद एक और कविता पढे
शुक्रवार, 15 जनवरी 2016
अनमोल वचन
रविवार, 10 जनवरी 2016
भारत में मकर संक्रान्ति
भारत
में
मकर
संक्रान्ति
सम्पूर्ण
भारत
में
मकर
संक्रान्ति
विभिन्न
रूपों
में
मनाया
जाता
है।
विभिन्न
प्रान्तों
में
इस
त्योहार
को
मनाने
के
जितने
अधिक
रूप
प्रचलित
हैं
उतने
किसी
अन्य
पर्व
में
नहीं।
हरियाणा
और
पंजाब
में
इसे
लोहड़ी
के
रूप
में
एक
दिन
पूर्व
१३
जनवरी
को
ही
मनाया
जाता
है।
इस
दिन
अँधेरा
होते
ही
आग
जलाकर
अग्निदेव
की
पूजा
करते
हुए
तिल
,
गुड़
,
चावल
और
भुने
हुए
मक्के
की
आहुति
दी
जाती
है।
इस
सामग्री
को
तिलचौली
कहा
जाता
है।
इस
अवसर
पर
लोग
मूंगफली
,
तिल
की
बनी
हुई
गजक
और
रेवड़ियाँ
आपस
में
बाँटकर
खुशियाँ
मनाते
हैं।
बहुएँ
घर
-
घर
जाकर
लोकगीत
गाकर
लोहड़ी
माँगती
हैं।
नई
बहू
और
नवजात
बच्चे
के
लिये
लोहड़ी
का
विशेष
महत्व
होता
है।
इसके
साथ
पारम्परिक
मक्के
की
रोटी
और
सरसों
के
साग
का
आनन्द
भी
उठाया
जाता
है
उत्तर
प्रदेश
में
यह
मुख्य
रूप
से
'
दान
का
पर्व
'
है।
इलाहाबाद
में
गंगा
,
यमुना
व
सरस्वती
के
संगम
पर
प्रत्येक
वर्ष
एक
माह
तक
माघ
मेला
लगता
है
जिसे
माघ
मेले
के
नाम
से
जाना
जाता
है।
१४
जनवरी
से
ही
इलाहाबाद
में
हर
साल
माघ
मेले
की
शुरुआत
होती
है।
१४
दिसम्बर
से
१४
जनवरी
तक
का
समय
खर
मास
के
नाम
से
जाना
जाता
है।
एक
समय
था
जब
उत्तर
भारत
में
है।
१४
दिसम्बर
से
१४
जनवरी
तक
पूरे
एक
महीने
किसी
भी
अच्छे
काम
को
अंजाम
भी
नहीं
दिया
जाता
था।
मसलन
शादी
-
ब्याह
नहीं
किये
जाते
थे
परन्तु
अब
समय
के
साथ
लोगबाग
बदल
गये
हैं।
परन्तु
फिर
भी
ऐसा
विश्वास
है
कि
१४
जनवरी
यानी
मकर
संक्रान्ति
से
पृथ्वी
पर
अच्छे
दिनों
की
शुरुआत
होती
है।
माघ
मेले
का
पहला
स्नान
मकर
संक्रान्ति
से
शुरू
होकर
शिवरात्रि
के
आख़िरी
स्नान
तक
चलता
है।
संक्रान्ति
के
दिन
स्नान
के
बाद
दान
देने
की
भी
परम्परा
है।
बागेश्वर
में
बड़ा
मेला
होता
है।
वैसे
गंगा
-
स्नान
रामेश्वर
,
चित्रशिला
व
अन्य
स्थानों
में
भी
होते
हैं।
इस
दिन
गंगा
स्नान
करके
तिल
के
मिष्ठान
आदि
को
ब्राह्मणों
व
पूज्य
व्यक्तियों
को
दान
दिया
जाता
है।
इस
पर्व
पर
क्षेत्र
में
गंगा
एवं
रामगंगा
घाटों
पर
बड़े
-
बड़े
मेले
लगते
है।
समूचे
उत्तर
प्रदेश
में
इस
व्रत
को
खिचड़ी
के
नाम
से
जाना
जाता
है
तथा
इस
दिन
खिचड़ी
खाने
एवं
खिचड़ी
दान
देने
का
अत्यधिक
महत्व
होता
है।
बिहार
में
मकर
संक्रान्ति
को
खिचड़ी
नाम
से
जाता
हैं।
इस
दिन
उड़द
,
चावल
,
तिल
,
चिवड़ा
,
गौ
,
स्वर्ण
,
ऊनी
वस्त्र
,
कम्बल
आदि
दान
करने
का
अपना
महत्त्व
है।
[2]
महाराष्ट्र
में
इस
दिन
सभी
विवाहित
महिलाएँ
अपनी
पहली
संक्रान्ति
पर
कपास
,
तेल
व
नमक
आदि
चीजें
अन्य
सुहागिन
महिलाओं
को
दान
करती
हैं।
तिल
-
गूल
नामक
हलवे
के
बाँटने
की
प्रथा
भी
है।
लोग
एक
दूसरे
को
तिल
गुड़
देते
हैं
और
देते
समय
बोलते
हैं
-"
लिळ
गूळ
ध्या
आणि
गोड़
गोड़
बोला
"
अर्थात
तिल
गुड़
लो
और
मीठा
-
मीठा
बोलो।
इस
दिन
महिलाएँ
आपस
में
तिल
,
गुड़
,
रोली
और
हल्दी
बाँटती
हैं।
बंगाल
में
इस
पर्व
पर
स्नान
के
पश्चात
तिल
दान
करने
की
प्रथा
है।
यहाँ
गंगासागर
में
प्रति
वर्ष
विशाल
मेला
लगता
है।
मकर
संक्रान्ति
के
दिन
ही
गंगा
जी
भगीरथ
के
पीछे
-
पीछे
चलकर
कपिल
मुनि
के
आश्रम
से
होकर
सागर
में
जा
मिली
थीं।
मान्यता
यह
भी
है
कि
इस
दिन
यशोदा
ने
श्रीकृष्ण
को
प्राप्त
करने
के
लिये
व्रत
किया
था।
इस
दिन
गंगासागर
में
स्नान
-
दान
के
लिये
लाखों
लोगों
की
भीड़
होती
है।
लोग
कष्ट
उठाकर
गंगा
सागर
की
यात्रा
करते
हैं।
वर्ष
में
केवल
एक
दिन
मकर
संक्रान्ति
को
यहाँ
लोगों
की
अपार
भीड़
होती
है।
इसीलिए
कहा
जाता
है
-"
सारे
तीरथ
बार
बार
,
गंगा
सागर
एक
बार।
"
तमिलनाडु
में
इस
त्योहार
को
पोंगल
के
रूप
में
चार
दिन
तक
मनाते
हैं।
प्रथम
दिन
भोगी
-
पोंगल
,
द्वितीय
दिन
सूर्य
-
पोंगल
,
तृतीय
दिन
मट्टू
-
पोंगल
अथवा
केनू
-
पोंगल
और
चौथे
व
अन्तिम
दिन
कन्या
-
पोंगल।
इस
प्रकार
पहले
दिन
कूड़ा
करकट
इकठ्ठा
कर
जलाया
जाता
है
,
दूसरे
दिन
लक्ष्मी
जी
की
पूजा
की
जाती
है
और
तीसरे
दिन
पशु
धन
की
पूजा
की
जाती
है।
पोंगल
मनाने
के
लिये
स्नान
करके
खुले
आँगन
में
मिट्टी
के
बर्तन
में
खीर
बनायी
जाती
है
,
जिसे
पोंगल
कहते
हैं।
इसके
बाद
सूर्य
देव
को
नैवैद्य
चढ़ाया
जाता
है।
उसके
बाद
खीर
को
प्रसाद
के
रूप
में
सभी
ग्रहण
करते
हैं।
इस
दिन
बेटी
और
जमाई
राजा
का
विशेष
रूप
से
स्वागत
किया
जाता
है।
असम
में
मकर
संक्रान्ति
को
माघ
-
बिहू
अथवा
भोगाली
-
बिहू
के
नाम
से
मनाते
हैं।
राजस्थान
में
इस
पर्व
पर
सुहागन
महिलाएँ
अपनी
सास
को
वायना
देकर
आशीर्वाद
प्राप्त
करती
हैं।
साथ
ही
महिलाएँ
किसी
भी
सौभाग्यसूचक
वस्तु
का
चौदह
की
संख्या
में
पूजन
एवं
संकल्प
कर
चौदह
ब्राह्मणों
को
दान
देती
हैं।
इस
प्रकार
मकर
संक्रान्ति
के
माध्यम
से
भारतीय
सभ्यता
एवं
संस्कृति
की
झलक
विविध
रूपों
में
दिखती
है।
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